परिस्तिथि एक, नज़रिये अनेक।


“जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन वैसी” 

कुछ रिश्ते हमारे जन्म के साथ ही जुड़े होते हैं और कुछ रिश्ते हम स्वयं बनाते हैं। परन्तु कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो मानवीय संवेदनाओं से बनते हैं और भावनाओं के साथ जुड़े जाते हैं। यद्यपि इन रिश्तों से दोनों ही पक्षों को किसी प्रकार की कोई आशा नहीं होती है फिर भी वे इतने खूबसूरत होते हैं कि दोनों पक्ष इसे महसूस तो करते हैं परन्तु व्यक्त करने के लिए ना तो उनके पास शब्द होते हैं और ना ही वे उनको व्यक्त करना चाहते हैं। 

यह कहानी भी मानवीय भावना को बड़ी ही बारीकी से व्यक्त करती है। जिसमे देखने का नजरिया हमें मानवीय भावनाओं की खूबसूरती को बताता है जिसमें, अमीर, गरीब, छोटा, बड़ा, कोई मायने नहीं रखता है। मायने रखता है तो सिर्फ आपका अपना नज़रिया। 

कहानी 

एक डलिया मे संतरे बेचती बूढी माँ से एक युवा व्यक्ति संतरे खरीदता था। अक्सर, खरीदे संतरों मे से एक संतरा निकाल कर उसकी एक फाँक चखता और कहता, "ये कम मीठा लग रहा हैं, देखो

बूढी माँ संतरे को चखती और प्रतिवाद करती "ना बाबू मीठा तो है।" वो युवा व्यक्ति उस संतरे को वही छोड कर, बाकि संतरे लेकर गर्दन झटकते हुए आगे बढ़ जाता। 

युवा अक्सर अपनी पत्नी के साथ होता था। एक दिन पत्नी ने पूछा "ये संतरे तो हमेशा मीठे होते हैं, पर ये नौटंकी तुम हमेशा क्यों करते हो?” 

युवा ने पत्नी को मधुर मुस्कान के साथ बताया "वो बूढी माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है, पर खुद कभी नहीं खाती है, मैं इस तरह से उसे एक संतरा खिला देता हूँ” 

एक दिन बूढी माँ से, उसके पड़ोस मे सब्जी बेचने वाली औरत ने कहा, ये झक्की लड़का संतरे लेते समय इतनी चख चख करता है, पर संतरे तोलते हुए मैं तेरे तराजू को देखती हूँ, तुम हमेशा उसकी चख चख में, उसे ज्यादा संतरे तोल देती हो

बूढी माँ ने कहा "उसकी चख चख संतरे के लिए नहीं, मुझे संतरा खिलाने के लिए होती है। वो समझता है कि मैं उसकी बात नहीं समझती हूँ, मैं तो बस उसका प्रेम देखती हूँ, तराजू मे संतरे तो अपने आप ज्यादा हो जाते हैं। 

मानवीय भावनाओं की खूबसूरती यहाँ दिखाई देती है 

व्यक्ति ने वृद्धा माँ को उस नजरिये से देखा जिसमे वो संतरे तो बेचती है पर अभाव के कारण स्वयं नहीं खाती है। अतः उसने उसे संतरा खिलाने के लिए चख चख की। 

पड़ोस मे सब्जी बेचने वाली उस औरत ने उस व्यक्ति को एक ग्राहक के रूप मे देखा और उसे लगा की वह व्यक्ति चख चख के बहाने ज्यादा संतरे लेलेता है। 

वृद्धा माँ ने उस व्यक्ति की नोटंकी के पीछे संतरा खिलाने की भावना और प्रेम को समझा और उसे लगा की उसे भी उसके लिए कुछ करना चाहिए और वृद्धा ने भी इस प्रेमभाव के बहाने ज्यादा संतरे दिए, जबकि वह व्यक्ति इस बात से अनजान था। 

विचारणीय योग्य 

हमें किसी भी रिश्ते के बारे मे इतनी जल्दी आंकलन नहीं करना चाहिए पहले यह सोचना चाहिए कि वो किस मंशा से ऐसा कर रहा है और उसे समझने का प्रयास करना चाहिए फिर उस बारे मे निर्णय लेना चाहिये। 

अतः ऐसे रिश्ते जो भावना तथा संवेदनाओं के आधार पर स्वयं बन जाते हैं ऐसे रिश्तों का सम्मान करना चाहिए बिना यह व्यक्त किये कि वह आपके लिए क्या कर रहा है या आप उन रिश्तों के लिए क्या कर रहे है। 

हो सकता है की भविष्य मे लोग आपको भूल जाये परन्तु यह नहीं भूल सकते की आपने उनके लिए क्या किया था। ऐसे रिश्ते ज्यादा मजबूत होते हैं और हमें ख़ुशी प्रदान करते हैं क्योंकि इनके पीछे किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं होता है। 

अंततः

चीजें तो वही होती हैं लेकिन देखने का नजरिया और भावना ही रिश्तों को अच्छा या बुरा बनाती है और उनसे जुड़े रहने के लिए प्रेरित करती है।

Comments

  1. Human relationships are defined beautifuly.

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  2. Well written. True, it all depends on how you see the world

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  3. True, its all about perceptions.

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  4. व्यक्ति की जैसी भावना होती है उसी के अनुरूप वह उस वस्तु को देखता है।
    Prof. Meenu Agrawal

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  5. Well written.. . its all about perceptions 👌👌

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  6. Very nice....I am always inspired by your stories... Thanks a lot mam

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  7. Very nice....I am always inspired by your stories... Thanks a lot mam

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  8. बहुत सुंदर और गहन अर्थ वाली कहानी है कभी कभी जिन्दगी में कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते और वो हमारे साथ जुड़ जाते है बस उनसे आत्मीय रूप से जुड़े रहना ही हमें और उन्हें बहुत खुशी प्रदान करता है।

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  9. लक्ष्य सही होना चाहिए।
    क्योंकि काम तोह दीमक भी दिन रात करती है,
    पर वह निर्माण नहीं विनाश करती है

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  10. आपका पोस्ट हमेशा ही ज्ञावर्धक होता है।
    @Newkidaa Blog

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  11. Very very nice blog mam. It is very inspired.

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  12. Very very nice blog mam. It is very inspired.

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  13. इस कहानी से ये शिक्षा मिलती है कि,, कोई भी मनुष्य किस बात को, किस प्रकार से समझता है। ये उसकी मानसिकता तय करती है। कोई दूसरों की थाली से भी छीन कर खाने में अपनी शान समझता है, तोह कोई अपनी थाली में से दूसरों को निवाला खिला कर संतुष्ट होता है।
    सारा खेल संस्कारो, समझ और मानसिकता का है। लेकिन एक बात तो तय हैं, कि छीन कर खाने वालो का कभी पेट नहीं भरता, और बांट कर खाने वाले कभी भी भूखे नहीं रहते ।।
    ����

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  14. It's like improving the quality of life of society starting from local vicinity.
    Good thoughts
    we all can be happy only if people including environment around us is happy

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  15. Very nice story

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  16. Very well written. Thought provoking :)

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  17. Inspiring story.... Very nice 👍

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  18. Atyant marmik kintu sandesh zindagi ka.

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  19. inspirational story...defining the real meaning of life ....to live with love compassion and respect not with hatred.Dr. Binaca Agrawal.

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  20. Really inspiring...har insaan ka sochne samajhne ka nazariya alag hota hai...kisi ki intention feelings to sahi nazariye se dekhna hi samajhdari hai.

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  21. Beautifully penned..this is actually we should see the life.

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  22. A very heartwarming story and well written.

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  23. This comment has been removed by the author.

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  24. Impressive story it's all about the person's vision towards people and world

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  25. Very beautiful article , we all should try to maintain the best relationship with each other and care for others

    Thanka for sharing this

    Mukul

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  26. inspiring story..

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  27. Very nice

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  28. Very beautifully defined the feelings. As we give vibrations to others, same we receive from them.

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  29. Nice article mam..keep it up

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  30. Anju
    बहुत ही अच्छी कहानी है इस कहानी से यही प्रेरणा मिलती है कि हमें अपने विचार सकारात्मक रखने चाहिए ।

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  31. Very true. A nice sorry emphasizing the importance of one's vision.
    Though, eyesight (nazar) can be corrected by external intervention; for correcting the vision (nazariya), one can do it only by internal correction or introspection.
    One has to have the right vision for understanding another and be rightly understood.
    Regards. Vinay Gupta.

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  32. अदबुध

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