भगवान का भोग
अक्सर हम सब के मन में यह विचार आता है कि हम भगवान को जो भोग लगाते हैं भगवान उसको किस रुप मे ग्रहण करते हैं, क्योंकि जब भोग को प्रसाद रुप में हम ग्रहण करते हैं तो उसके स्थूल रुप कोई कमी नहीं होती हैं अपितु उसका स्वाद पहले की अपेक्षा बढ़ जाता हैं?
यह जिज्ञासा बचपन में मुझे बहुत होती थी और मेरी माँ मुझे समझाती थी कि जब हम भोग लगाने के लिए अपनी आखँ बंद करते हैं तो भगवान चुपके से आकर भोग लगा जाते हैं और इस कारण उसका स्वाद बढ़ जाता हैं। धीरे धीरे यही बात मेरी लिए सत्य हो गयी। परन्तु यह जिज्ञासा हमेशा बनी रही कि भोग स्थूल रुप में हैं और भगवान कण कण मे सूक्ष्म रुप में समाया हुआ है तो यह संभव कैसे हो सकता है?
परन्तु जब मैंने गुरु ज्ञान पढ़ा तो स्थूल रुप और सूक्ष्म रुप समझ आया। सही कहा है कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता है।आज वही सब मैं आप से शेयर करना चाहती हूँ।
"क्या भगवान् हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग खाते हैं? यदि खाते हैं तो वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं हो जाती हैं और यदि नहीं खाते हैं तो भोग लगाने का क्या लाभ?" एक शिष्य ने पाठ के बीच अपने गुरु से प्रश्न किया। गुरु ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया। वे पूर्ववत अपना पाठ पढ़ाते रहे। उस दिन उन्होंने पाठ के अंत में एक श्लोक पढ़ाया
पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
(परमात्मा पूर्ण है यह सृष्टि पूर्ण है, पूर्ण परमात्मा से पूर्ण सृष्टि उतपन्न होती है, पूर्ण परमात्मा से पूर्ण सृष्टि ले लेने पर पूर्ण परमात्मा ही शेष रहता है। अर्थात ईश्वर सर्वव्यापक है सभी पदार्थ उसी से उत्पन्न होते है और उसमें ही समां जाते हैं, ईश्वर में सभी पदार्थ और सभी पदार्थों में ईश्वर समाया हुआ है।)
पाठ पूरा होने के बाद गुरु ने सभी शिष्यों से कहा कि वे सब श्लोक को कंठस्थ कर लें।
एक घंटे के बाद गुरु ने सब शिष्यों से पूछा कि उन्हें श्लोक कंठस्थ हो गया क्या? शिष्यों के हाँ कहने पर गुरु जी ने सबसे पहले प्रश्न करने वाले शिष्य से कहा कि वह सुनाये। शिष्य ने श्लोक वैसे का वैसा शुद्ध रुप सुना दिया परन्तु गुरुजी ने ना में सिर हिला दिया, तो शिष्य ने कहा गुरुजी आप चाहे तो किताब में देख लें, श्लोक बिलकुल शुद्ध हैं।"
गुरु जी ने पुस्तक दिखाते हुए कहा -"श्लोक तो पुस्तक में ही है, तुम्हें कैसे याद हो गया?" शिष्य चुप रहा।
तब गुरुजी ने समझाया -"पुस्तक में जो श्लोक है वह स्थूल रुप में है। तुमने जब श्लोक पढ़ा,तो वह सूक्ष्म रुप में तुम्हारे अंदर प्रवेश कर गया। उसी सूक्ष्म रुप में वह तुम्हारे अंदर रहता है इतना ही नहीं ,जब तुमने उसको कंठस्थ कर लिया, तब भी पुस्तक के स्थूल रुप के श्लोक मे कोई कमी नहीं आयी। इसी प्रकार ईश्वर को चढ़ाये गए भोग को वह सूक्ष्म रुप में ग्रहण कर लेते हैं और इससे स्थूल रुप में कोई कमी नहीं आती हैं। उसी को हम प्रसाद रुप में ग्रहण करते हैं।
शिष्य को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था और मुझे भी।
आप सभी को शरदीय नवरात्रों की शुभकामनायें।

Very nice.
ReplyDeleteHmm bhagvan ko jo bhog lgate h bhagvan use sukshm rup me grhn krte h iss bhar km nahi hota or test double ho jata h Name Rashmi
Deleteबहुत अच्छा मैम
ReplyDeleteशिवानी शर्मा
भगवान को भोग लगाने की बहुत अच्छी व्याख्या की है। शायद सभी पाठकों का संदेह दूर हो गया होगा।
ReplyDeleteप्रो० मीनू अग्रवाल
Nice thouthou
ReplyDeleteNice mam
ReplyDeleteBeautiful explanation of Lord and Bhog..ishwar is everywhere... beautiful blog.... Dr.Binaca Agrawal
ReplyDeleteRightly explained with very easy and basic activity. Even it answered my query as well. Now onwards, I will more effectively convince my kids. This also upholds the very existence of human being and nature.
ReplyDeleteGreat work you've done.
बहुत सुन्दर
ReplyDeleteAur mujhe bhi uttar mil gaya.bahut hi Sundar 👍👌👌👏👏
ReplyDeleteVery nice 👌👌👌
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteGreat ma'am. Today I also got the answer of my question too.
ReplyDeleteAccurate n easy explaination ...mind blowing 👌👏👍
ReplyDeleteNice story
ReplyDeleteNice story
ReplyDeleteIt is true that God is everywhere and nothing is without God
ReplyDeleteGreat thinking mam
And so inspiring story
Excellent story 💯 I pray to god to keep you always happy
ReplyDeleteVery nice Masi 😃😃👍👍
ReplyDeleteGreat article mam
ReplyDelete@sushant
This story was amazing
ReplyDeleteVery good and easy explanation. It's true that God is present in every small particle but is intangible.
ReplyDeleteबहुत सुन्दर कथा है। आज तक यह प्रश्न कभी मेरे दिमाग में नहीं आया। और शिष्य के प्रश्न का अत्यंत सुन्दर उत्तर गुरु ने दिया। यह स्थिति तो हमारे जीवन के हर पहलू एवं दृष्टिकोण में उपस्थित ही नहीं, बल्कि समाहित है।
ReplyDeleteकथा के लिए सादर धन्यवाद।
अति सुंदर व्यख्यान
ReplyDeleteअति सुंदर व्यख्यान
ReplyDeleteNice Explanation
ReplyDeleteA very common question in mind Very well explained
ReplyDeleteVision started growing glowing
ReplyDeleteI wish Dayanand Saraswati had met you
ReplyDeleteVery nice blog mam.
ReplyDeletevery nicely explained
ReplyDeleteNicely explained mam ...
ReplyDeleteIntresting....
ReplyDeleteVery nice story
ReplyDelete👌👌👍
ReplyDelete🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteVery interesting!
ReplyDeleteWell explained
ReplyDelete🙏🙏🙏🙏
ReplyDeleteNice Article well written
ReplyDeletethanks for sharing
mukul
Progressive progressions
ReplyDeleteOm Namo bhagwate vasudevay 🙏
ReplyDeleteGood explanation by Guru god is every where
ReplyDeleteNice blog .god is every where
ReplyDeleteJiski wjha se hme bhojan mil rha hai usme se bhot lgana ya samrpit krna bhagwan ka sukriya krne ke lia bhot lgya jata h ki jitna unhone hme diya uske lia sukriya
ReplyDeleteSHIVANI
Very nice story mam
ReplyDelete👍👍
ReplyDeletevery nice
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