गुरु ज्ञान



'गुरु कभी साधारण नहीं है घनानंद, प्रलय और निर्माण उसकी गोद में खेलते हैं'
--आचार्य चाणक्य

आज के तकनीकी युग में गूगल के रुप में हमारे पास ज्ञान का एक विशाल भंडार है, जिससे हम जब चाहे जितनी मात्रा में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु क्या यह ज्ञान उतना ही शुद्ध एवं परिष्कृत होता है जितना एक गुरु हमें अपने जीवन के अनुभव के निचोड़ के रुप मे प्रदान करता है?

गुरु हमें तब तक ज्ञान प्रदान नहीं करता जब तक वह उस ज्ञान का स्वयं परीक्षण नहीं कर लेता है और हम उस ज्ञान के योग्य नहीं हो जाते है। गुरु हमेशा हमारे अहंकार को नष्ट करके हमें सरल और सौम्य बनाता है और तभी गुरु के साथ हमारा सम्बन्ध बना रह सकता है। ज्ञान हमेशा झुक कर और अपने आप को समर्पित करके ही प्राप्त किया जा सकता है। 

हमारे एक पारिवारिक मित्र ने गुरु महिमा की यह कहानी भेजी जिसे मैं आप सब के साथ शेयर करना चाहती हूँ।

एक शिष्य गुरु के पास आया। वह गुरु से भी ज्यादा प्रसिद्ध था व पंडित भी। गुरु से अधिक सारे शास्त्र उसे कंठस्थ थे। समस्या यह थी कि सभी शास्त्र कंठस्थ होने के बाद भी वह सत्य की खोज नहीं कर सका था। ऐसे में जीवन के अंतिम समय में उसने गुरु की तलाश आरंभ की। संयोग से अति विद्वान् गुरु भी मिल गए। वह उनकी शरण में पहुंच गया।

गुरु ने पंडित की ओर देखा और कहा, 'तुम लिख लाओ कि तुम क्या क्या जानते हो? तुम जो जानते हो, उसकी क्या बात करनी है? तुम जो नहीं जानते उसको मैं बता दूंगा।'

शिष्य को वापिस आने में वर्ष भर लग गया क्योंकि उसे तो बहुत सारे शास्त्र स्मरण थे और अपने ज्ञान का अहंकार भी। वह सब लिखता रहा, लिखता ही रहा। कई हजार पृष्ठ भर गए। तब वह पोथी लेकर आया।

गुरु ने फिर कहा 'यह बहुत अधिक है। मैं बूढ़ा हो गया हूँ। मेरी मृत्यु निकट है इतना न पढ़ सकूंगा। तुम इसे और संक्षिप्त कर लाओ, सार लिख लाओ।' 

पंडित फिर चला गया। तीन महीने लग गए उसे और संक्षिप्त करने में। अब केवल सौ पृष्ठ थे। 

गुरु ने फिर कहा 'यह भी अधिक है। इसे और संक्षिप्त कर लाओ।'

अबकी बार शिष्य कुछ समय बाद ही लौट आया और एक ही पन्ने पर सार सूत्र लिख लाया था, लेकिन गुरु बिल्कुल मरने के करीब थे। गुरु ने कहा 'तुम्हारे लिए ही रुका हुआ हूँ। तुम्हे समझ कब आएगी? इसे और संक्षिप्त करके लाओ! शिष्य को होश आया। भागा! दूसरे कमरे से कोरा कागज ले आया। गुरु के हाथ में कोरा कागज दिया। 

गुरु ने कहा 'अब तुम शिष्य हुए। मुझसे तुम्हारा सम्बन्ध बना रहेगा।'

कोरा कागज लाने का अर्थ हुआ, मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं, मैं अज्ञानी हूँ! जो ऐसे भाव रख सके वही शिष्य होता है। गुरु ज्ञान का वह दरिया होता है जिससे खाली घड़ा तो भरा जा सकता परन्तु भरे घड़े को नहीं भरा जा सकता है। 

भगवान राम स्वयं विद्वान् थे शास्त्रों के ज्ञाता थे फिर भी उन्होंने लक्ष्मण को रावण के अंतिम समय में उससे शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा। लक्ष्मण ने सर की तरफ खड़े होकर ज्ञान लेना चाहा परन्तु रावण ने मना कर दिया तब राम ने कहा 'पैरों के तरफ खड़े होकर ही ज्ञान प्राप्त हो सकता है।' यही सही मार्ग है गुरु से शिक्षा प्राप्त करने का।

गुरु ज्ञान लेते समय यह भाव मन मे नहीं होना चाहिए 'मुझे तो सब आता है बस थोड़ा सा नहीं आता है। भाव यह होना चाहिए कि मुझे कुछ नहीं आता है।' गुरु से अज्ञानी बन कर ही ज्ञान प्राप्त हो सकता है स्वयम्भू बन कर गुरु ज्ञान नहीं मिलता है। 

विजय दशमी की आप सभी को शुभकामनाएं 
🙏

Comments

  1. बहुत बढ़िया

    ReplyDelete
    Replies
    1. Very well presented, very relevant for present time !

      Delete
  2. Absolutely relevant in present scenario where people carry google sir and test knowledge of teacher. Google can provide information only. There is difference between Wisdom (Gyan) and Education (Shiksha). Great write up Didi.

    ReplyDelete
  3. ज्ञानवर्धक

    ReplyDelete
  4. एक्सीलेंट

    ReplyDelete
  5. Only blank is worthy
    to be utilized for any Pocument,
    Record,
    Prose,
    Poetry....
    Velour literature
    Or
    Pious ligature.

    ReplyDelete
  6. Guru se Mila gyaan hame Google nhi de sakta..... Ek Guru ka sthaan koi bhi le sakta.
    It's a very nice story.

    ReplyDelete
  7. Vah pratyek vyakti hamara Guru hota hai jisse ham Apne Jeevan mein kuch naya sikhate Hain. Atah ham Kitna hi gyan prapt kar le parantu ham Apne Guru se Jyada Nahin Jaan Sakte. Ek Guru hi hota hai jo hamen Sahi aur galat ka Marg Darshan karata hai.

    ReplyDelete
  8. A teacher is the one who teaches you everything

    ReplyDelete
  9. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  10. Very very nice .....True
    Eye opening story.....

    ReplyDelete
  11. Guru will always be Guru
    Very nice

    ReplyDelete
  12. गुरु की महिमा अपरंपार है।
    बीना शर्मा

    ReplyDelete
  13. Jab hum man m ye rkhenge ki hme kuch nahi aata tbhi guru ka gyan jyada milega bahut sahi bat h
    Shivani

    ReplyDelete
  14. Marvelous
    Prof. Meenu Agrawal

    ReplyDelete
  15. Amazing.... beautiful message to be grasped....Dr.Binaca

    ReplyDelete
  16. Really beautiful

    ReplyDelete
  17. Very good guru ki mahima. Ka. Bakhan ati sunder

    ReplyDelete
  18. बहुत सुंदर और शिष्यों के लिए प्रेरणास्पद

    ReplyDelete
  19. Fantastic message... Guru always give best message

    ReplyDelete
  20. Great story and great message for all those who really seek to learn something.

    ReplyDelete
  21. Ek guru hi guru ki mahima or shishye ki mansthiti ko smgh skta h

    ReplyDelete
  22. Very nice article
    Thanks for sharing

    ReplyDelete
  23. Very nice article.
    Thanks for sharing

    Mukul

    ReplyDelete
  24. great message, and nicely written

    ReplyDelete
  25. There is nothing in life without a teacher.
    Teacher is the only person who can make an illiterate a learned person.
    So always respect your teacher and the greatest teacher in our life is our mother.

    ReplyDelete
  26. Absolutely right. Teacher is great personality.

    ReplyDelete
  27. कबीर दास जी कहते हैं – गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय ।।
    शिक्षक वह व्यक्ति है जो हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाते हैं। जो व्यक्ति अपनी शिक्षा और गुरु का सम्मान नहीं कर पाता, वह जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता । शिक्षक वह मोमबत्ती है जो खुद जलकर सबको उजाला देता है।



    ReplyDelete
  28. Universal truth. We have to rub clean the slate before writing.

    ReplyDelete
  29. Very nice lesson. We should always try to learn things.


    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

Kitchen Gardening (Part 4)

Kitchen Gardening (Part 6): Chemical Fertilizer

Kitchen Gardening (Part 5)