Posts

Showing posts from October, 2020

दर्शन प्रभाव

Image
ऐसा माना जाता है कि भगवान की पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए क्योंकि जब भगवान का मुख हमारी तरफ होता है तो हम बुरे कर्म करने में हिचकते हैं और सोचते हैं कि भगवान हमें देख रहे हैं परन्तु जब भगवान की पीठ हमारी तरफ होती हैं तो हम यह सोचते हैं कि भगवान नहीं देख रहे हैं। परन्तु वास्तव में भगवान तो कण कण में व्याप्त होतें हैं जो हमारे अच्छे और बुरे दोनों ही कर्मों का हिसाब रखते हैं। प्रश्न यह उत्पन होता है कि भगवान् की पीठ के दर्शन क्यों नहीं करने चाहिए? क्या पीठके दर्शन करने से पुण्य समाप्त हो जाते हैं? इस सम्बन्ध मे एक कथा है जब श्री कृष्ण जरासंध से युद्ध कर रहे थे तब जरासंध की सहायता करने असुर कालयवन युद्ध करने आगया। उसने श्री कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा। तब श्री कृष्ण वहां से भाग निकले (रणभूमि से भागने के कारण ही उनका नाम रणछोड़ पड़ा था)। जब श्री कृष्ण भाग रहे थे तो कालयवन भी उनके पीछे भागने लगा। भगवान के इस तरह से भागने का कारण यह था कि कालयवन के पिछले पुण्य बहुत ज्यादा थे और ऐसे किसी को भी सजा नहीं दी जा सकती थी जब तक कि उसके पुण्यों का बल शेष रहता है। कालयवन भगवान् की पीठ देखते हुए भागने ल...

गुरु ज्ञान

Image
'गुरु कभी साधारण नहीं है घनानंद, प्रलय और निर्माण उसकी गोद में खेलते हैं' --आचार्य चाणक्य आज के तकनीकी युग में गूगल के रुप में हमारे पास ज्ञान का एक विशाल भंडार है, जिससे हम जब चाहे जितनी मात्रा में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु क्या यह ज्ञान उतना ही शुद्ध एवं परिष्कृत होता है जितना एक गुरु हमें अपने जीवन के अनुभव के निचोड़ के रुप मे प्रदान करता है? गुरु हमें तब तक ज्ञान प्रदान नहीं करता जब तक वह उस ज्ञान का स्वयं परीक्षण नहीं कर लेता है और हम उस ज्ञान के योग्य नहीं हो जाते है। गुरु हमेशा हमारे अहंकार को नष्ट करके हमें सरल और सौम्य बनाता है और तभी गुरु के साथ हमारा सम्बन्ध बना रह सकता है। ज्ञान हमेशा झुक कर और अपने आप को समर्पित करके ही प्राप्त किया जा सकता है।  हमारे एक पारिवारिक मित्र ने गुरु महिमा की यह कहानी भेजी जिसे मैं आप सब के साथ शेयर करना चाहती हूँ। एक शिष्य गुरु के पास आया। वह गुरु से भी ज्यादा प्रसिद्ध था व पंडित भी। गुरु से अधिक सारे शास्त्र उसे कंठस्थ थे। समस्या यह थी कि सभी शास्त्र कंठस्थ होने के बाद भी वह सत्य की खोज नहीं कर सका था। ऐसे में जीवन के अंतिम समय ...

भगवान का भोग

Image
अक्सर हम सब के मन में यह विचार आता है कि हम भगवान को जो भोग लगाते हैं भगवान उसको किस रुप मे ग्रहण करते हैं, क्योंकि जब भोग को प्रसाद रुप में हम ग्रहण करते हैं तो उसके स्थूल रुप कोई कमी नहीं होती हैं अपितु उसका स्वाद पहले की अपेक्षा बढ़ जाता हैं?  यह जिज्ञासा बचपन में मुझे बहुत होती थी और मेरी माँ मुझे समझाती थी कि जब हम भोग लगाने के लिए अपनी आखँ बंद करते हैं तो भगवान चुपके से आकर भोग लगा जाते हैं और इस कारण उसका स्वाद बढ़ जाता हैं। धीरे धीरे यही बात मेरी लिए सत्य हो गयी। परन्तु यह जिज्ञासा हमेशा बनी रही कि भोग स्थूल रुप में हैं और भगवान कण कण मे सूक्ष्म रुप में समाया हुआ है तो यह संभव कैसे हो सकता है?  परन्तु जब मैंने गुरु ज्ञान पढ़ा तो स्थूल रुप और सूक्ष्म रुप समझ आया। सही कहा है कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता है।आज वही सब मैं आप से शेयर करना चाहती हूँ।  "क्या भगवान् हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग खाते हैं? यदि खाते हैं तो वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं हो जाती हैं और यदि नहीं खाते हैं तो भोग लगाने का क्या लाभ?" एक शिष्य ने पाठ के बीच अपने गुरु से प्रश्न किया। गुरु ने तत्काल कोई ...

पतंग की उड़ान

Image
अर्जुन कृष्ण जी से अक्सर जीवन दर्शन के विषय में पूछा करते थे और कृष्ण उनको प्रेम भाव से समझाया करते थे।  एक बार अर्जुन ने कृष्ण से पूछा माधव! ये सफल जीवन क्या होता है? क्या जीवन में और अधिक सफलता प्राप्त करने के लिए हमे अपने उन समस्त संबंधों को छोड़ देना चाहिए जो हमारी सफलता में सहायक होते हैं, क्योंकि कभी कभी ये बंधन हमें आगे नहीं बढने देते हैं और हम उतनी सफलता प्राप्त नहीं कर पाते हैं?  कृष्ण समझ गए अर्जुन के मन में ऐसा कुछ घट रहा है जो वो व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं। शायद तात श्री का कौरवों का पक्ष लेना उनको व्यथित कर रहा हैं और तात श्री क्योंकि अर्जुन को भी बेहद प्यार करते हैं अतः अर्जुन इस सम्बन्धं समझ नहीं पा रहे हैं।  कृष्ण समझ गए यदि अर्जुन की इस समस्या का समाधान नहीं किया गया तो यह समस्या विकराल रुप ले लेगी। उन्होंने अर्जुन से कहा चलो पतंग उड़ाते हैं।  कृष्ण अर्जुन को पतंग उड़ाने के लिए ले गए। अर्जुन कृष्ण को ध्यान से पतंग उड़ाते हुए देख रहे थे अचानक थोड़ी देर बाद अर्जुन कृष्ण से बोले…  माधव…इन धागों की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की ओर नहीं जा पा रह...

प्रतिबिम्ब

Image
एक बार एक गुरुजी गंगा के किनारे स्नान कर रहे थे। वहां पर एक राहगीर आया और उसने गुरुजी से पूछा, "महाराज इस गांव में कैसे लोग रहते हैं, क्योंकि मैं अपने मौजूदा निवास स्थान से कहीं और जाना चाहता हूँ।"  गुरुजी बोले, "तुम अभी जहाँ पर रहते हो वहां किस प्रकार के लोग रहते हैं?"  राहगीर ने कहा "मैं जहाँ पर रहता हूँ वहां पर एक से एक कपटी, दुष्ट और बेहद बुरे लोग रहते है।"  गुरुजी बोले " तुम्हें बिलकुल उसी प्रकार के लोग यहाँ मिलेंगे कपटी, दुष्ट और बेहद बुरे " गुरुजी ने अपनी बात पूरी की और अपने कार्यों मे लग गए। इतना सुनकर राहगीर वहां से चला गया।  कुछ समय बाद एक दूसरा राहगीर वहां से गुजरा। उसने भी गुरुजी से वही प्रश्न पूछा "मुझे किसी नयी जगह अपना निवास स्थान बनाना हैं क्या आप बता सकते हैं कि यहाँ पर किस तरह के लोग रहते हैं?"  गुरुजी ने इस राहगीर से भी वही प्रश्न किया "जहाँ तुम अभी निवास करते हो वहां किस प्रकार के लोग रहते हैं?"  राहगीर ने कहा "जी वहां तो बड़े सभ्य, सुलझे और अच्छे लोग रहते हैं।"  "तुम्हें बिलकुल उसी प्रकार के ...