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Showing posts from August, 2020

Second Chance

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"Sometimes all you need is a second chance, because time was not ready for the first one"   समुद्र के किनारे एक लहर आयी और एक बच्चे की चप्पल अपने साथ बहा कर ले गयी, बच्चे ने अंगुली से रेत पर लिखा “समुद्र चोर है” उसी समुद्र के दूसरे किनारे पर कुछ मछुआरों ने बहुत सारी मछलियां पकड़ी, एक मछुआरे ने रेत पर ऊँगली से लिखा “समुद्र मेरा पालनहार है” एक युवक समुद्र मे डूब कर मर गया, उसकी माँ ने रेत पर लिखा 'समुद्र हत्यारा है’ दूसरे किनारे पर एक गरीब बूढ़ा, टेढ़ी कमर लिए रेत पर टहल रहा था, उसे एक बड़ी सीप में अनमोल मोती मिला, उसने रेत पर ऊँगली से लिखा 'समुद्र दानी है’ अचानक एक बड़ी लहर आयी और सारे लिखे को मिटा कर चली गयी। हो सकता है कि जब वो बच्चा, माँ, मछुआरा या वृद्ध व्यक्ति फिर से समुद्र किनारे जाएँ तो परिस्थितियां बदल जाएँ। अतः एक बार की परिस्तिथी के अनुसार इमेज ना बनाकर अपने आप को दूसरा मौका देना चाहिए जैसा कि समुद्र की लहरों ने किया आयी और सारे लिखे को मिटा कर चली गयी। फिर चाहे लोग कुछ भी कहें हमे अपने रिश्ते और उनके प्रति अपनी इमेज वक्त के हिसाब से तय करनी चाहिए और वैसे ही रहना ...

राजा और उसका नाई

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राजा के यहाँ एक नाई प्रतिदिन हजामत बनाने आता था। वह राजा का मुँह लगा था। वह प्रतिदिन सोचता था कि मैं तो रोज आता हूँ और मंत्री तीन चार दिन में एक बार आता है और अपनी सलाह देकर चला जाता है। यह काम तो मैं भी कर सकता हूँ।  वह राजा से यही बात कहता था। एक दिन उसने फिर राजा से यही बात कही, उस दिन राजा बेहद खुश था। राजा ने कहा ठीक है "मैं तुम्हे मंत्री बना दूंगा परन्तु मंत्री बनाने से पहले तुम दोनों को एक काम दूंगा, जो उसको कर देगा वही मंत्री होगा।"  राजा ने नाई से कहा "बंदरगाह पर एक जहाज खड़ा है जाकर पता करो कहाँ से आया है और क्यों आया है?" नाई बोला महाराज इसमें क्या मुश्किल है? मैं अभी पता करके आया। नाई गया और तुरंत वापिस आकर बोला कि "जहाज फ्रांस से आया है और कल से खड़ा है।"  राजा ने फिर कहा "यह तो पता करो क्यों आया है", नाई फिर गया और तुरंत वापिस आकर बोला "महाराज जहाज मे मॉल लदा हुआ है और यहाँ पर बेचने के लिए आया है।" राजा उसको बार बार बातें बताता और वह उतनी ही बात पता कर के आ जाता।  अब, राजा ने मंत्री को बुलाया और कहा "देखो बंदरगाह पर एक ...

परिस्तिथि एक, नज़रिये अनेक।

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“जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन वैसी”  कुछ रिश्ते हमारे जन्म के साथ ही जुड़े होते हैं और कुछ रिश्ते हम स्वयं बनाते हैं। परन्तु कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो मानवीय संवेदनाओं से बनते हैं और भावनाओं के साथ जुड़े जाते हैं। यद्यपि इन रिश्तों से दोनों ही पक्षों को किसी प्रकार की कोई आशा नहीं होती है फिर भी वे इतने खूबसूरत होते हैं कि दोनों पक्ष इसे महसूस तो करते हैं परन्तु व्यक्त करने के लिए ना तो उनके पास शब्द होते हैं और ना ही वे उनको व्यक्त करना चाहते हैं।  यह कहानी भी मानवीय भावना को बड़ी ही बारीकी से व्यक्त करती है। जिसमे देखने का नजरिया हमें मानवीय भावनाओं की खूबसूरती को बताता है जिसमें, अमीर, गरीब, छोटा, बड़ा, कोई मायने नहीं रखता है। मायने रखता है तो सिर्फ आपका अपना नज़रिया।  कहानी  एक डलिया मे संतरे बेचती बूढी माँ से एक युवा व्यक्ति संतरे खरीदता था। अक्सर, खरीदे संतरों मे से एक संतरा निकाल कर उसकी एक फाँक चखता और कहता, "ये कम मीठा लग रहा हैं, देखो । "  बूढी माँ संतरे को चखती और प्रतिवाद करती "ना बाबू मीठा तो है।" वो युवा व्यक्ति उस संतरे को वही छोड कर, ...

Out-of-the-box Thinking

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“A peaceful mind can think better than a worked-up mind. Allow a few minutes of silence to your mind every day, and see, how sharply it helps u to set your life the way you expect it to be”  किसी गॉंव मे एक किसान रहता था। उसने गॉंव के जमींदार से काफी धन उधार लिया हुआ था। जमींदार बूढ़ा व कुरुप था। किसान की बेटी बहुत सुंदर थी साथ ही बहुत बुद्धिमान भी थी।  किसान की बेटी को देख कर उसने सोचा कि किसान की बेटी से शादी कि जाय। यह सोच कर वह किसान की पास गया और बोला "तुम अपनी बेटी की शादी मेरे साथ कर दो मैं तुम्हारा सारा कर्ज माफ कर दूंगा।”  जमींदार की बात सुनकर किसान ने कहा "चलो पंचायत की पास चलते हैं और वे जो निर्णय लेंगे हम दोनों ही उसको मान लेंगे।"  वे पंचायत की पास गए और उन्हें सारी बात बताई। उनकी बात सुन कर पंचायत ने थोड़ा विचार किया और कहा "इसका फैसला नहीं किया जा सकता क्योंकि किसान ने उधार लिया हुआ है अतः इसका फैसला किस्मत पर छोड़ते हैं।"  पंचायत ने फिर कहा "जमींदार सामने पड़े पत्थरों मे से एक सफेद और एक काले रंग का पत्थर एक थैले में रखेगा और लड़की बिना देखे ही थ...

पद से महत्वपूर्ण काम

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“बड़े पद पर रहना महत्वपूर्ण नहीं, बड़े काम करना महत्वपूर्ण है” महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ। दोनों पक्षों की तरफ के योद्धा मारे गए। पांडवों की तरफ के अनेकों योद्धा व उनके पुत्र मारे गए, परन्तु महाराजा धृतराष्ट्र के सभी पुत्र मारे गए। पुत्रों के वियोग से दुखी धृतराष्ट्र ने महात्मा विदुर को बुलाया। उनके साथ सत्संग में दुःख हल्का करने लगे।  चर्चा के बीच धृतराष्ट्र ने विदुर से पूछा कि कौरवों की सेना में एक से बढ़कर एक वीर योद्धा इतना सक्षम था कि उसने सेनापति बनने पर पांडवो के छक्के छुड़ा दिए, यह जानते हुए भी कि यह जीवन मरण का युद्ध है, यदि वो सब मिलकर एक साथ बिना सेनापति बने भी पराक्रम दिखाते तो क्या हम युद्ध जीत ना जाते ?  विदुर जी बोले – ‘राजन, आप ठीक सोचते हैं’ यदि वो ऐसा करते तो युद्ध जीत सकते थे, परन्तु अकेले यश बटोरने की इच्छा तथा अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की महत्वकांक्षा ने कर्तव्य को सोचने, उसे निभाने की उमंग को पैदा करने का अवसर ही नहीं दिया।  क्या हम भी तो अपने जीवन में ऐसा नही करते? अपना सर्वश्रेष्ठ हम तब तक नही देते जब तक कि हमें काम में प्रमुखता और दूसरों से ऊं...